पूर्वोत्तर भारत के
जंगलों और तेज़ी से बहने वाली पहाड़ी नदियों में 15 साल की खोज के बाद वैज्ञानिकों ने \'कैस्केड फ्रॉग\'
(झरने के पास रहने वाले मेंढक) की तीन नई प्रजातियों का पता लगाया
है। इनमें से एक प्रजाति का नाम केरल की एक समाज सेविका की याद में रखा गया है,
जिन्हें प्यार से \"अम्माची\" कहा जाता था। त्रिपुरा,
नागालैंड और पश्चिम बंगाल में हुई ये खोजें इस बात का और सबूत देती
हैं कि पूर्वोत्तर में अभी भी ऐसी जैव-विविधता मौजूद है जिसके बारे में कोई
जानकारी दर्ज नहीं है।
ये नतीजे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के
वैज्ञानिक जर्नल \'बुलेटिन
ऑफ़ द म्यूज़ियम ऑफ़ कम्पेरेटिव ज़ूलॉजी\' में प्रकाशित हुए
हैं। यह जर्नल 1863 से प्रकाशित हो रहा है। इस अध्ययन में
कैस्केड फ्रॉग की पाँच ऐसी प्रजातियों के बारे में भी बताया गया है जिन्हें पहले
भारत में नहीं देखा गया था। इससे देश में इस समूह की ज्ञात विविधता और बढ़ गई है।
ये तीनों नई प्रजातियाँ \'अमोलोप्स\' (Amolops) जीनस से संबंधित हैं। इन्हें आम तौर पर \'कैस्केड
फ्रॉग\' कहा जाता है क्योंकि ये अक्सर चट्टानी झरनों और जंगल
की तेज़ी से बहने वाली नदियों के आसपास पाए जाते हैं। इस जीनस की लगभग 100 प्रजातियाँ पूरे एशिया में पाई जाती हैं।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के
प्रोफ़ेसर एस. डी. बीजू की अगुवाई वाली रिसर्च टीम ने पूर्वोत्तर भारत के सभी सात
राज्यों के पहाड़ी इलाकों में 15 साल से
ज़्यादा समय तक खोज की। अध्ययन के दौरान, वैज्ञानिकों ने
कैस्केड फ्रॉग की 300 से ज़्यादा भौगोलिक आबादी (populations)
का रिकॉर्ड तैयार किया। डीएनए विश्लेषण और वयस्क मेंढकों व टेडपोल
(मेंढक के बच्चों) की बारीकी से जाँच के बाद यह पता चला कि इनमें से तीन आबादी ऐसी
प्रजातियों की थीं जिनके बारे में विज्ञान को पहले कोई जानकारी नहीं थी।
लगभग 80 मिमी आकार वाले इस मध्यम-आकार
के मेंढक का शरीर हल्के भूरे रंग का होता है और उस पर जैतून-हरे रंग के जालीदार
निशान होते हैं। दूसरी नई प्रजाति, \'अमोलोप्स सेंडेन्यू\'
(Amolops sendenyu) या \'सेंडेन्यू कैस्केड
फ्रॉग\' की खोज नागालैंड में हुई थी। इसका नाम सेंडेन्यू गाँव
के नाम पर रखा गया है, जहाँ यह पाया गया था। तीसरी प्रजाति,
*अमोलोप्स बेला* (Amolops bella) या \'ब्यूटीफुल कैस्केड फ्रॉग\' (Beautiful Cascade Frog), पश्चिम बंगाल में खोजी गई। इसका नाम इसके शानदार हरे शरीर पर पीले-हरे या
लाल-भूरे रंग के मोज़ेक पैटर्न के कारण रखा गया है। हिमालय की एक प्राचीन कहानी की
झलक इन तीन नई प्रजातियों के अलावा, यह स्टडी इस बात का भी
संकेत देती है कि कैस्केड फ्रॉग पूरे एशिया में कैसे फैले और उनमें विविधता कैसे
आई। DNA-आधारित डेटिंग से पता चलता है कि इस समूह में लगभग 3.2
करोड़ (32 मिलियन) साल पहले, इओसीन-ओलिगोसीन (Eocene-Oligocene) बदलाव के दौरान
बड़े पैमाने पर विविधता आई थी। यह समय जलवायु और पारिस्थितिकी में बड़े बदलावों का
दौर था, जिसमें पौधों और जानवरों के समूहों में बड़े पैमाने
पर बदलाव हुए थे। रिसर्चर्स को एशिया में पूर्व से पश्चिम की ओर कैस्केड फ्रॉग के
बसने (colonisation) की कई लहरों के सबूत मिले। उन्होंने
हिमालय के शुरुआती उभार को भी इन मेंढकों के आज के वितरण और विविधता को आकार देने
में एक महत्वपूर्ण कारक माना है, जो प्रजातियों की
\"हिमालय के अंदर और बाहर\" जटिल आवाजाही की ओर इशारा करता है। मुख्य लेखक
प्रोफेसर एस. डी. बीजू ने कहा, \"यह स्टडी भारत के
कैस्केड फ्रॉग्स का व्यापक अध्ययन करने के लिए 15 से अधिक
वर्षों का काम है।\" उन्होंने कहा कि इस समूह का वर्गीकरण (taxonomical)
करना चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन इस स्टडी ने
इसके जीव विज्ञान के कई उलझे हुए पहलुओं को स्पष्ट करने में मदद की है और इससे
प्रजातियों की पहचान और संरक्षण में सहायता मिलेगी। उन्होंने आगे कहा कि ये नतीजे
इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि भारत के कई जानवरों के समूहों का अध्ययन बहुत कम
हुआ है, खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में, जो हिमालय और इंडो-बर्मा बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट का हिस्सा हैं।