अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग बांध परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और विवाद का मुद्दा चर्चा में है। इस परियोजना का उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन के साथ-साथ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है, लेकिन इसके संभावित सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर स्थानीय समुदायों की चिंताएं भी सामने आती रही हैं। इसी बीच, राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) की ओर से स्थानीय समर्थन जुटाने के लिए करीब 11 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की खबर ने नए सवाल खड़े किए हैं। इस खर्च का उद्देश्य, इसके तहत आयोजित गतिविधियां और स्थानीय लोगों की सहमति हासिल करने की प्रक्रिया अब चर्चा के केंद्र में हैं। परियोजना के विरोध से जुड़े तनाव और हिंसा की घटनाओं ने भी स्थिति को संवेदनशील बना दिया है।
प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की क्षमता लगभग 11,200 मेगावाट बताई जा रही है। सरकार और परियोजना समर्थकों का तर्क है कि यह परियोजना ऊर्जा सुरक्षा और चीन की ओर से यारलुंग त्सांगपो नदी पर प्रस्तावित विशाल बांध से जुड़ी रणनीतिक चिंताओं के मद्देनजर महत्वपूर्ण हो सकती है। वहीं, विरोध कर रहे आदिवासी संगठनों और किसानों को आशंका है कि बांध के निर्माण से उनकी पुश्तैनी जमीन, कृषि भूमि, गांवों और आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है। क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी उनकी चिंताओं का हिस्सा है
एनएचपीसी के जनसंपर्क अभियान पर खर्च की गई करीब 10.9 करोड़ रुपये की राशि को लेकर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि स्थानीय समर्थन जुटाने के प्रयासों के बावजूद परियोजना का विरोध जारी है। आलोचकों के अनुसार, स्थानीय लोगों का विश्वास हासिल करने के लिए केवल प्रचार और विकास योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं; प्रभावित समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी देना भी जरूरी है। पहले भी सियांग क्षेत्र के किसान संगठनों ने एनएचपीसी की कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी यानी सीएसआर निधि के इस्तेमाल और प्रभावित गांवों से पर्याप्त परामर्श नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई थी।