सांस लेना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं. लेकिन यही साधारण-सी लगने वाली आदत हमारे शरीर की ऊर्जा, नींद और लंबी अवधि की सेहत को गहराई से प्रभावित कर सकती है. खासकर तब, जब सांस नाक की बजाय मुंह से ली जा रही हो और वो भी बिना हमें पता चले. अक्सर लोग मानते हैं कि मुंह से सांस लेना सिर्फ तब होता है जब नाक बंद हो या भारी एक्सरसाइज चल रही हो. लेकिन कई मामलों में यह एक आदत बन जाती है, खासकर नींद के दौरान. सुबह उठते समय सूखे होंठ, बार-बार प्यास लगना या हल्की थकान ये सब संकेत हो सकते हैं कि सांस लेने का तरीका बदल गया है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
बेंगलुरु के SDMIAH में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सम्हिता उल्लोड बताती हैं कि \"मुंह से सांस लेना यानी नाक की जगह मुंह से सांस लेना एक असामान्य स्थिति मानी जाती है, खासकर अगर यह नींद के दौरान लगातार हो। ऐसे मामलों में सही जांच और इलाज जरूरी होता है.\" असल में हमारा शरीर नाक से सांस लेने के लिए ही बना है. नाक सिर्फ हवा का रास्ता नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती है. यह हवा को साफ करती है, उसमें नमी जोड़ती है और धूल व बैक्टीरिया को रोकती है. जब हम मुंह से सांस लेते हैं, तो ये पूरी प्रक्रिया छूट जाती है.
क्या होती है दिक्कत
डॉ. उल्लोड के मुताबिक \"नाक से सांस लेने पर हवा फिल्टर होती है, ह्यूमिडिफाई होती है और हानिकारक कणों को शरीर में जाने से रोका जाता है.\" लेकिन मुंह से सांस लेने पर ठंडी, सूखी और बिना फिल्टर की हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे समय के साथ सांस लेने पर असर पड़ सकता है. इसका एक और बड़ा असर एनर्जी स्तर पर पड़ता है. कई बार लोग पूरी नींद लेने के बाद भी थकान महसूस करते हैं. इसकी एक वजह मुंह से सांस लेना भी हो सकता है. इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है.डॉ. उल्लोड बताती हैं कि इससे थकान, ध्यान में कमी और धीरे-धीरे श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा, नींद की गुणवत्ता भी खराब होती है. मुंह से सांस लेने की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है, भले ही हमें इसका एहसास न हो. नींद से जुड़ी यह समस्या आगे चलकर स्लीप एपनिया जैसी गंभीर स्थिति को भी बढ़ा सकती है. डॉ. उल्लोड कहती हैं कि यह आदत स्लीप एपनिया को और खराब कर सकती है और नींद को टुकड़ों में बांट देती है.
बच्चों पर क्या होता है असर
बच्चों में इसका असर और भी गहरा हो सकता है। लंबे समय तक मुंह से सांस लेने से चेहरे की बनावट, दांतों की स्थिति और यहां तक कि पोस्टर पर भी असर पड़ सकता है. अच्छी बात यह है कि इस आदत को बदला जा सकता है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कारण को पहचानना. अगर नाक बंद रहती है, एलर्जी है या साइनस की समस्या है, तो पहले उसका इलाज जरूरी है. इसके साथ ही प्राणायाम जैसी ब्रीदिंग एक्सरसाइज, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना मददगार साबित हो सकता है.